वाल्मीकि रामायण 6.116.35
नखैः शुष्कमुखीभिश्च दारणैर्लङ्घनैर्हतैः ।निपात्य हन्तुमिच्छामि तव विप्रियकारिणीः॥
nakhaiḥ śuṣkamukhībhiśca dāraṇairlaṅghanairhataiḥ |nipātya hantumicchāmi tava vipriyakāriṇīḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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