वाल्मीकि रामायण 6.116.51
तामेवमुक्त्वा राजन्तीं सीतां साक्षादिव श्रियम् ।आजगाम महावेगो हनुमान् यत्र राघवः॥
tāmevamuktvā rājantīṃ sītāṃ sākṣādiva śriyam |ājagāma mahāvego hanumān yatra rāghavaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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