वाल्मीकि रामायण 6.117.10
एवमुक्ता तु वेदेही प्रत्युवाच विभीषणम् ।अस्नाता द्रष्टुमिच्छामि भर्तारं राक्षसाधिप॥
evamuktā tu vedehī pratyuvāca vibhīṣaṇam |asnātā draṣṭumicchāmi bhartāraṃ rākṣasādhipa ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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