वाल्मीकि रामायण 6.117.14
आरोप्य शिबिकां दीप्तां परार्ध्याम्बरसंवृताम् ।रक्षोभिर्बहुभिर्गुप्तामाजहार विभीषणः॥
āropya śibikāṃ dīptāṃ parārdhyāmbarasaṃvṛtām |rakṣobhirbahubhirguptāmājahāra vibhīṣaṇaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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