वाल्मीकि रामायण 6.117.15
सो ऽभिगम्य महात्मानं ज्ञात्वा ऽपि ध्यानमास्थितम् ।प्रणतश्च प्रहृष्टश्च प्राप्तं सीतां न्यवेदयत्॥
so 'bhigamya mahātmānaṃ jñātvā 'pi dhyānamāsthitam |praṇataśca prahṛṣṭaśca prāptaṃ sītāṃ nyavedayat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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