वाल्मीकि रामायण 6.117.18
राक्षसाधिपते सौम्य नित्यं मद्विजये रत ।वैदेही सन्निकर्षं मे शीघ्रं समुपगच्छतु॥
rākṣasādhipate saumya nityaṃ madvijaye rata |vaidehī sannikarṣaṃ me śīghraṃ samupagacchatu ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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