वाल्मीकि रामायण 6.117.19
स तद्वचनमाज्ञाय राघवस्य विभीषणः ।तूर्णमुत्सारणे यत्नं कारयामास सर्वतः॥
sa tadvacanamājñāya rāghavasya vibhīṣaṇaḥ |tūrṇamutsāraṇe yatnaṃ kārayāmāsa sarvataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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