वाल्मीकि रामायण 6.117.20
कञ्चुकोष्णीषिणस्तत्र वेत्रजर्जरपाणयः ।उत्सारयन्तः पुरुषाः समन्तात् परिचक्रमुः॥
kañcukoṣṇīṣiṇastatra vetrajarjarapāṇayaḥ |utsārayantaḥ puruṣāḥ samantāt paricakramuḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें