वाल्मीकि रामायण 6.117.24
संरब्धश्चाब्रवीद्रामश्चक्षुषा प्रदहन्निव ।विभीषणं महाप्राज्ञं सोपालम्भमिदं वचः॥
saṃrabdhaścābravīdrāmaścakṣuṣā pradahanniva |vibhīṣaṇaṃ mahāprājñaṃ sopālambhamidaṃ vacaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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