वाल्मीकि रामायण 6.117.32
कलत्रनिरपेक्षैश्च इङ्गितैरस्य दारुणैः ।अप्रीतमिव सीतायां तर्कयन्ति स्म राघवम्॥
kalatranirapekṣaiśca iṅgitairasya dāruṇaiḥ |aprītamiva sītāyāṃ tarkayanti sma rāghavam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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