वाल्मीकि रामायण 6.117.34
सा वस्त्रसंरुद्धमुखी लज्जया जनसंसदि ।रुरोदासाद्य भर्तारमार्यपुत्रेति भाषिणी॥
sā vastrasaṃruddhamukhī lajjayā janasaṃsadi |rurodāsādya bhartāramāryaputreti bhāṣiṇī ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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