वाल्मीकि रामायण 6.117.7
दिव्याङ्गरागां वैदेहीं दिव्याभरणभूषिताम् ।इह सीतां शिरस्स्नातामुपस्थापय मा चिरम्॥
divyāṅgarāgāṃ vaidehīṃ divyābharaṇabhūṣitām |iha sītāṃ śirassnātāmupasthāpaya mā ciram ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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