वाल्मीकि रामायण 6.118.11
पश्यतस्तां तु रामस्य भूयः क्रोधो व्यवर्धत ।प्रभूताज्यावसिक्त्स्य पावकस्येव दीप्यतः॥
paśyatastāṃ tu rāmasya bhūyaḥ krodho vyavardhata |prabhūtājyāvasiktsya pāvakasyeva dīpyataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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