वाल्मीकि रामायण 6.118.13
यत् कर्तव्यं मनुष्येण धर्षणां परिमार्जता ।तत् कृतं सकलं सीते शत्रुहस्तादमर्षणात्॥
yat kartavyaṃ manuṣyeṇa dharṣaṇāṃ parimārjatā |tat kṛtaṃ sakalaṃ sīte śatruhastādamarṣaṇāt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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