वाल्मीकि रामायण 6.118.14
निर्जिता जीवलोकस्य तपसा भावितात्मना ।अगस्त्येन दुराधर्षा मुनिना दक्षिणेव दिक्॥
nirjitā jīvalokasya tapasā bhāvitātmanā |agastyena durādharṣā muninā dakṣiṇeva dik ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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