वाल्मीकि रामायण 6.118.23
सुग्रीवे वानरेन्द्रे वा राक्षसेन्द्रे विभीषणे ।निवेशय मनः सीते यथा वा सुखमात्मनः॥
sugrīve vānarendre vā rākṣasendre vibhīṣaṇe |niveśaya manaḥ sīte yathā vā sukhamātmanaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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