वाल्मीकि रामायण 6.118.24
न हि त्वां रावणो दृष्ट्वा दिव्यरूपां मनोरमाम् ।मर्षयेत चिरं सीते स्वगृहे परिवर्तिनीम्॥
na hi tvāṃ rāvaṇo dṛṣṭvā divyarūpāṃ manoramām |marṣayeta ciraṃ sīte svagṛhe parivartinīm ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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