वाल्मीकि रामायण 6.120.27
जगत् सर्वं शरीरं ते स्थैर्यं ते वसुधातलम् ।अग्निः कोपः प्रसादस्ते सोमः श्रीवत्सलक्षणः॥
jagat sarvaṃ śarīraṃ te sthairyaṃ te vasudhātalam |agniḥ kopaḥ prasādaste somaḥ śrīvatsalakṣaṇaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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