वाल्मीकि रामायण 6.121.11
विशुद्धभावां निष्पापां पतिगृह्णीष्व राघव ।न किञ्चिदभिधातव्यमहमाज्ञापयामि ते॥
viśuddhabhāvāṃ niṣpāpāṃ patigṛhṇīṣva rāghava |na kiñcidabhidhātavyamahamājñāpayāmi te ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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