वाल्मीकि रामायण 6.121.2
स विधूय चितां तां तु वैदेहीं हव्यवाहनः ।उत्तस्थौ मूर्तिमानाशु गृहीत्वा जनकात्मजाम्॥
sa vidhūya citāṃ tāṃ tu vaidehīṃ havyavāhanaḥ |uttasthau mūrtimānāśu gṛhītvā janakātmajām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें