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वाल्मीकि रामायण 6.122.26
स शापः केकयीं घोरः सपुत्रां न स्पृशेत् प्रभो॥
sa śāpaḥ kekayīṃ ghoraḥ saputrāṃ na spṛśet prabho ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलेंस शापः केकयीं घोरः सपुत्रां न स्पृशेत् प्रभो॥
sa śāpaḥ kekayīṃ ghoraḥ saputrāṃ na spṛśet prabho ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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