वाल्मीकि रामायण 6.122.3
दिष्ट्या सर्वस्य लोकस्य प्रवृद्धं दारुणं तमः ।अपावृत्तं त्वया सङ्ख्ये राम रावणजं भयम्॥
diṣṭyā sarvasya lokasya pravṛddhaṃ dāruṇaṃ tamaḥ |apāvṛttaṃ tvayā saṅkhye rāma rāvaṇajaṃ bhayam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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