वाल्मीकि रामायण 6.124.1
तां रात्रिमुषितं रामं सुखोत्थितमरिन्दमम् ।अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं जयं पृष्ट्वा विभीषणः॥
tāṃ rātrimuṣitaṃ rāmaṃ sukhotthitamarindamam |abravīt prāñjalirvākyaṃ jayaṃ pṛṣṭvā vibhīṣaṇaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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