वाल्मीकि रामायण 6.125.14
अब्रवीच्च विमानस्थः पूजयन् सर्ववानरान् ।सुग्रीवं च महावीर्यं काकुत्स्थः सविभीषणम्॥
abravīcca vimānasthaḥ pūjayan sarvavānarān |sugrīvaṃ ca mahāvīryaṃ kākutsthaḥ savibhīṣaṇam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें