वाल्मीकि रामायण 6.125.15
मित्रकार्यं कृतमिदं भवद्भिर्वानरोत्तमाः ।अनुज्ञाता मया सर्वे यथेष्टं प्रतिगच्छत॥
mitrakāryaṃ kṛtamidaṃ bhavadbhirvānarottamāḥ |anujñātā mayā sarve yatheṣṭaṃ pratigacchata ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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