वाल्मीकि रामायण 6.125.24
प्रियात् प्रियतरं लब्धं यदहं ससुहृज्जनः ।सर्वैर्भवद्भिः सहितः प्रीतिं लप्स्ये पुरीं गतः॥
priyāt priyataraṃ labdhaṃ yadahaṃ sasuhṛjjanaḥ |sarvairbhavadbhiḥ sahitaḥ prītiṃ lapsye purīṃ gataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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