वाल्मीकि रामायण 6.125.8
एव सम्मानिताश्चैते मानार्हा मानद त्वया ।भविष्यन्ति कृतज्ञेन निर्वृता हरियूथपाः॥
eva sammānitāścaite mānārhā mānada tvayā |bhaviṣyanti kṛtajñena nirvṛtā hariyūthapāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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