वाल्मीकि रामायण 6.16.14
यथा मधुकर्स्तराषात्काशपुष्पम् पिबन्नपि ।रसमत्र न विन्देत तथानार्येषु सौहृदम्॥
yathā madhukarstarāṣātkāśapuṣpam pibannapi |rasamatra na vindeta tathānāryeṣu sauhṛdam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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