वाल्मीकि रामायण 6.16.15
यथा पूर्वम् गजः स्नात्वा गृह्य हस्तेन वै रजः ।दूषयत्यात्मनो देहम् तथानार्येषु सौहृदम्॥
yathā pūrvam gajaḥ snātvā gṛhya hastena vai rajaḥ |dūṣayatyātmano deham tathānāryeṣu sauhṛdam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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