वाल्मीकि रामायण 6.16.2
वसेत् सह सपत्नेन क्रुद्धेन आशी विषेण च ।न तु मित्र प्रवादेन सम्वस्च्चत्रुणा सह॥
vaset saha sapatnena kruddhena āśī viṣeṇa ca |na tu mitra pravādena samvasccatruṇā saha ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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