वाल्मीकि रामायण 6.17.39
शत्रोः सकाशात् सम्प्राप्तः सर्वथा शन्क्य एव हि ।विश्वास योग्यः सहसा न कर्तव्यो विभीषणः॥
śatroḥ sakāśāt samprāptaḥ sarvathā śankya eva hi |viśvāsa yogyaḥ sahasā na kartavyo vibhīṣaṇaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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