वाल्मीकि रामायण 6.17.61
अशक्यः सहसा राजन् भावो वेत्तुम् परस्य वै ।अन्तः स्वभावैर् गीतैस् तैर् नैपुण्यम् पश्यता भृशम्॥
aśakyaḥ sahasā rājan bhāvo vettum parasya vai |antaḥ svabhāvair gītais tair naipuṇyam paśyatā bhṛśam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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