वाल्मीकि रामायण 6.22.3
मत्कार्मुकनिसृष्टेन शरवर्षेण सागर ।परम् तीरम् गमिष्यन्ति पद्भिरेव प्लवङ्गमाः॥
matkārmukanisṛṣṭena śaravarṣeṇa sāgara |param tīram gamiṣyanti padbhireva plavaṅgamāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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