वाल्मीकि रामायण 6.23.14
इत्येवमुक्त्वा धन्वी स रामः सम्ग्रामधर्षणः ।प्रतस्थे पुरतो रामो लङ्कामभिमुखो विभुः॥
ityevamuktvā dhanvī sa rāmaḥ samgrāmadharṣaṇaḥ |pratasthe purato rāmo laṅkāmabhimukho vibhuḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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