वाल्मीकि रामायण 6.29.15
हताव् एव कृतघ्नौ तौ मयि स्नेह परान् मुखौ ।एवम् उक्तौ तु सव्रीडौ ताव् उभौ शुक सारणौ॥
hatāv eva kṛtaghnau tau mayi sneha parān mukhau |evam uktau tu savrīḍau tāv ubhau śuka sāraṇau ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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