वाल्मीकि रामायण 6.3.2
तरसा सेतु बन्धेन सागर उच्चोषणेन वा ।सर्वथा सुसमर्थो अस्मि सागरस्य अस्य लन्घने॥
tarasā setu bandhena sāgara uccoṣaṇena vā |sarvathā susamartho asmi sāgarasya asya langhane ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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