वाल्मीकि रामायण 6.37.30
विप्रकार प्रियः क्षुद्रो वर दान बल अन्वितः ।परिक्रामति यः सर्वाम्ल् लोकान् सम्तापयन् प्रजाः॥
viprakāra priyaḥ kṣudro vara dāna bala anvitaḥ |parikrāmati yaḥ sarvāml lokān samtāpayan prajāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें