वाल्मीकि रामायण 6.39.11
भृन्ग राज अभिगीतानि भ्रमरैः सेवितानि च ।कोणालक विघुष्टानि सारस अभिरुतानि च॥
bhṛnga rāja abhigītāni bhramaraiḥ sevitāni ca |koṇālaka vighuṣṭāni sārasa abhirutāni ca ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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