वाल्मीकि रामायण 6.40.28
उत्पपात तदाकाशं जितकाशी जितक्लमः ।रावणः स्थित एवात्र हरिराजेन वञ्चितः॥
utpapāta tadākāśaṃ jitakāśī jitaklamaḥ |rāvaṇaḥ sthita evātra harirājena vañcitaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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