वाल्मीकि रामायण 6.41.15
रक्तचन्दनसङ्काशा सन्ध्या परमदारुणा ।ज्वलच्च निपतत्येतदादित्यादग्निमण्डलम्॥
raktacandanasaṅkāśā sandhyā paramadāruṇā |jvalacca nipatatyetadādityādagnimaṇḍalam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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