वाल्मीकि रामायण 6.41.27
ततः पश्चात् सुमहती पृतनर्क्षवनौकसाम् ।प्रच्छाद्य महतीं भूमिमनुयाति स्म राघवम्॥
tataḥ paścāt sumahatī pṛtanarkṣavanaukasām |pracchādya mahatīṃ bhūmimanuyāti sma rāghavam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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