वाल्मीकि रामायण 6.41.32
लङ्कायास्तूत्तरद्वारं शलशृङ्गमिवोन्नतम् ।रामः सहानुजो धन्वी जुगोप च रुरोध च॥
laṅkāyāstūttaradvāraṃ śalaśṛṅgamivonnatam |rāmaḥ sahānujo dhanvī jugopa ca rurodha ca ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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