वाल्मीकि रामायण 6.41.57
रामलक्ष्मणगुप्ता सा सुग्रीवेण च वाहिनी ।बभूव दुर्धर्षतरा सर्वैरपि सुरासुरैः॥
rāmalakṣmaṇaguptā sā sugrīveṇa ca vāhinī |babhūva durdharṣatarā sarvairapi surāsuraiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें