वाल्मीकि रामायण 6.41.83
रावणस्य वचः श्रुत्वा दीप्ताग्निसमतेजसः ।जगृहुस्तं ततो घोराश्चत्वारो रजनीचराः॥
rāvaṇasya vacaḥ śrutvā dīptāgnisamatejasaḥ |jagṛhustaṃ tato ghorāścatvāro rajanīcarāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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