वाल्मीकि रामायण 6.41.97
कृत्स्नं हि कपिभिर्व्याप्तं प्राकारपरिखान्तरम् ।ददृशू राक्षसा दीनाः प्राकारं वानरीकृतम्॥
kṛtsnaṃ hi kapibhirvyāptaṃ prākāraparikhāntaram |dadṛśū rākṣasā dīnāḥ prākāraṃ vānarīkṛtam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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