वाल्मीकि रामायण 6.45.8
निरन्तरशरीरौ तौ भ्रातरौ रामलक्ष्णौ ।क्रुद्धेनेन्द्रजिता वीरौ पन्नगैः शरतां गतैः॥
nirantaraśarīrau tau bhrātarau rāmalakṣṇau |kruddhenendrajitā vīrau pannagaiḥ śaratāṃ gataiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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