वाल्मीकि रामायण 6.46.47
तत्र रावणमासीनमभिवाद्य कृताञ्जलिः ।आचचक्षे प्रियं पित्रे निहतौ रामलक्ष्मणौ॥
tatra rāvaṇamāsīnamabhivādya kṛtāñjaliḥ |ācacakṣe priyaṃ pitre nihatau rāmalakṣmaṇau ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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