वाल्मीकि रामायण 6.49.20
सुरुष्टेनापि वीरेण लक्ष्मणेन न संस्मरे ।परुषं विप्रियं वापि श्रावितं तु कदाचन॥
suruṣṭenāpi vīreṇa lakṣmaṇena na saṃsmare |paruṣaṃ vipriyaṃ vāpi śrāvitaṃ tu kadācana ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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