वाल्मीकि रामायण 6.52.19
प्रासैः प्रमथिताः केचिद्वानराः शोणितस्रवाः ।मुद्गरैराहताः केचित् पतिता धरणीतले॥
prāsaiḥ pramathitāḥ kecidvānarāḥ śoṇitasravāḥ |mudgarairāhatāḥ kecit patitā dharaṇītale ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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