वाल्मीकि रामायण 6.52.37
स विह्वलितसर्वाङ्गो गिरिशृङ्गेण ताडितः ।पपात सहसा भूमौ विकीर्ण इव पर्वतः॥
sa vihvalitasarvāṅgo giriśṛṅgeṇa tāḍitaḥ |papāta sahasā bhūmau vikīrṇa iva parvataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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